अपनी बुद्धिमानी और चतुराई के कारण तेनालीराम महाराज कृष्ण देवराय के अतिप्रिय थे. इस कारण राजगुरू और अन्य दरबारी उनसे ईर्ष्या करते थे. सभी ऐसे अवसर की प्रतीक्षा में रहते थे, जब वे तेनाली राम को महाराज के समक्ष नीचा दिखा सकें. एक दिन राजगुरू ने सबके साथ मिलकर तेनालीराम को अपमानित करने की योजना बनाई और महाराज के पास जा पहुँचे.

राजा कृष्णदेव राय की माता बहुत वृद्ध हो चली थी और अक्सर बीमार रहा करती थी. एक बार वे गंभीर रूप से बीमार पड़ी. उन्हें महसूस होने लगा था कि उनका अंतिम समय निकट है. मृत्यु पूर्व वे अपना प्रिय फल आम दान करना चाहती थी. उन्होंने राजा कृष्णदेव राय को अपनी अंतिम इच्छा के बारे में बताया. किंतु इसके पूर्व कि उनकी अंतिम इच्छा पूर्ण हो पाती, वे चल बसी. इस प्रकार उनकी अंतिम इच्छा अपूर्ण रह गई.

राजा कृष्णदेव राय का जन्मदिन प्रतिवर्ष बड़े ही धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया जाता था. परंपरा अनुसार इस शुभ-अवसर पर महल में यज्ञ होता और सात नदियों के जल से महाराज का अभिषेक किया जाता था. इन दिन पूरे नगर में रंगारंग कार्यक्रम होते, जिसमें प्रतिष्ठित कलाकार लोगों के मनोरंजन के लिए नृत्य, गायन और अभिनय की मनमोहक प्रस्तुति दिया करते थे.

राजा कृष्णदेव राय और तेनाली राम वार्तालाप कर रहे थे. अचानक उनके मध्य झूठ बोलने के विषय पर चर्चा चल पड़ी. तेनाली राम ने राजा से कहा कि लोगों को जब भी मौका मिलता है, वे झूठ बोल देते हैं. राजा कृष्णदेव राय तेनाली राम की इस बात से सहमत नहीं थे. वे बोले, “ऐसा नहीं हैं. लोग तभी झूठ बोलते हैं, जब अपरिहार्य होता है. विजय नगर के सिंहासन पर विराजमान होने के उपरांत मैंने कभी झूठ नहीं बोला..

विजयनगर के महाराज कृष्णदेव राय अपने महल की दीवारों पर चित्रकारी करवाना चाहते थे. उन्होंने यह जिम्मेदारी एक चित्रकार को सौंपी. चित्रकार ने महल की दीवारों पर बहुत से चित्र बनाये. जिसने भी उन चित्रों को देखा, उसकी भरपूर प्रशंषा की. तेनाली राम भी चित्रों को देख रहे थे. एक चित्र को देखते हुए उनके मन में कौतूहल जागा. उस चित्र की पृष्ठभूमि में प्राकृतिक दृश्य थे, किंतु अन्य पक्षों को उसमें उकेरा नहीं गया था.

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