बहुत समय पहले की बात है. एक गाँव में एक सज्जन और ईमानदार व्यक्ति रहता था. गाँव के सभी लोग उसकी बहुत प्रशंषा करते थे. सभी लोगों का प्रशंषापात्र होने के कारण वह बहुत प्रसन्न था. एक दिन की बात है. काम से लौटते हुए उसे अपने आगे कुछ दूरी पर चलते हुए लोगों की बातें सुनाई पड़ी. वे उसके बारे में ही बातें कर रहे थे. वह जानता था कि गाँव के लोग उसकी प्रशंषा के पुल बांधा करते है.

एक जंगल में एक बारहसिंघा रहता था. उसे अपने सुंदर बारह सींगों पर बड़ा घमंड था. जब भी वह पानी पीने नदी पर जाता, तो नदी के स्वच्छ और शांत जल में अपने सुंदर सींगों को देखकर बहुत खुश होता. किंतु अपने पतले और भद्दे पैरों को देखकर दु;खी हो जाता. वह हमेशा सोचता कि भगवान ने उसे सींग तो बड़े सुंदर दिए हैं, लेकिन पैर बहुत ही भद्दे. ऐसे पैर किस काम के?

जंगल के बीचों-बीच एक नदी बहती थी. उस नदी के किनारे एक मेंढक अपने तीन बच्चों के साथ रहता था. वे सभी खाते-पीते बाहरी दुनिया से अलग बड़े ही आराम की जिंदगी गुज़ार रहे थे. खा-पीकर मेंढक ने अच्छी सेहत बना ली थी. उसे देखकर उसके बच्चों को लगता कि दुनिया में उनके पिता जैसा विशाल और शक्तिशाली दूसरा कोई नहीं है. मेंढक को भी इस बात का अहंकार था.

गर्मियों के दिन थे. एक प्यासा कौआ पानी की तलाश में यहाँ-वहाँ भटक रहा था. किंतु कई जगहों पर भटकने के बाद भी उसे पानी नहीं मिला. लगातार उड़ते रहने के कारण वह बहुत थक गया था और तेज गर्मी में उसकी प्यास बढ़ती जा रही थी. धीरे-धीरे वह अपना धैर्य खोने लगा. उसे लगने लगा कि आज उसकी मृत्यु निश्चित है.

एक समय की बात है. एक जलाशय में एक मेंढक रहता था. उसके कोई मित्र नहीं थे, इसलिए वह बहुत उदास रहा करता था. वह हमेशा भगवान से एक अच्छा मित्र भेजने की प्रार्थना करता, ताकि उसकी उदासी और अकेलापन दूर हो सके. उस जलाशय के पास ही एक पेड़ के नीचे बिल में एक चूहा रहता था. वह बहुत ही हँसमुख स्वभाव का था. एक दिन मेंढक को देखकर वह उसके पास गया और बोला, “मित्र, कैसे हो तुम?”

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