यह घटना पंडित जवाहर लाल नेहरू के तमिलनाडु दौरे की है. जब तमिलनाडु के लोगों को पता चला कि पंडित नेहरू उनके शहर में हैं, तो उन्हें देखने हुजूम उमड़ पड़ा. जिस रास्ते से उनका काफ़िला गुज़र रहा था, उसके किनारे पर लोगों की कतारें लगी हुई थी. यहाँ तक कि कई लोग दीवारों और पेड़ों पर भी चढ़े हुए थे ताकि पंडित नेहरू की एक झलक मिल जाये. कार में बैठे-बैठे अचानक पंडित नेहरू की नज़र दूर सड़क किनारे खड़े एक गुब्बारे वाले पर पड़ी. वह अपने पंजों के बल खड़ा होकर उचक-उचक कर उन्हें देखने की कोशिश कर रहा था. इस कोशिश में उसके कदम डगमगा रहे थे और उसके हाथ के रंगीन गुब्बारे डोल रहे हैं.

यह घटना उस समय की है, जब पंडित जवाहर लाल नेहरू किशोरावस्था में थे. उनके पिता मोतीलाल नेहरू न सिर्फ इलाहबाद के एक मशहूर बैरिस्टर थे, बल्कि एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे. भारत की स्वतंत्रता की मुहिम में वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे, जिसे देख बालक नेहरू बहुत प्रभावित थे. धीरे-धीरे वे भी परतंत्रता और स्वतंत्रता के जीवन में अंतर को समझ रहे थे.

प्रधानमंत्री बनने के बाद एक बार पंडित जवाहर लाल नेहरू इलाहबाद में कुंभ मेले गए. प्रधानमंत्री के आगमन की बात सुनकर वहाँ अपार जन-समूह उमड़ पड़ा. लोगों की भीड़ के बीच उनकी कार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी. लोग पंडित जी को देखने के लिए उतावले थे. जैसे ही वे उनकी झलक पाते, उनमें उत्साह और खुशी की लहर दौड़ पड़ती. पूरा वातावरण ‘जवाहरलाल नेहरू की जय’ के नारों से गुंजायमान था.

यह घटना १९३६ के ओलंपिक हॉकी वर्ल्ड कप फाइनल की है. फाइनल में भारत का मुकाबला जर्मनी से था. इस मैच को देखने के लिए स्टेडियम २५००० से भी ज्यादा दर्शकों से भरा हुआ था. उस दिन विशेष रूप से जर्मनी के तानाशाह हिटलर भी स्टेडियम में मैच देखने के लिए मौजूद थे. उस मैच में भारत ने जर्मनी को ०८-०१ से बुरी तरह हराकर ओलंपिक हॉकी का गोल्ड मैडल जीत लिया था. ०८ गोल में से ०३ गोल मेजर ध्यानचंद ने दागे थे. अपनी टीम की करारी हार को देखकर हिटलर बौखला गया था और मैच बीच में छोड़कर चला गया था.

उस समय सरदार पटेल भारतीय लेजिस्लेटिव असेंबली के अध्यक्ष थे. एक दिन वे असेंबली का कार्य संपन्न कर घर के लिए निकलने ही वाले थे कि एक अंग्रेज दंपत्ति वहाँ पहुँच गया. वे दोनों भारत भ्रमण के लिए विलायत से आये थे और असेंबली देखना चाहते थे. सरदार पटेल सादा जीवन उच्च विचार में आस्था रखते थे. लेजिस्लेटिव असेंबली के अध्यक्ष होने के बाद भी उनका पहनावा अत्यंत साधारण होता था. बढ़ी हुई दाढ़ी और सादे वस्त्रों में देखकर अंग्रेज दंपत्ति उन्हें चपरासी समझ बैठे और उनसे असेंबली भवन घुमाने के लिए कहा.

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