एक अंधा आदमी एक बड़ी ईमारत की सीढ़ियों पर सुबह से बैठा हुआ था. अपनी ओर लोगों का ध्यान खींचने के लिए उसने अपने बगल में एक स्लेट रखी हुई थी, जिस पर लिखा हुआ था : “मैं अँधा हूँ. मेरी मदद करें.” लोगों के पैसे डालने के लिए उसने अपने पैरों के पास अपनी टोपी उल्टी करके रखी हुई थी.
दोपहर को एक पत्रकार वहाँ से गुजरा. उसने देखा कि उस अंधे आदमी की टोपी में बहुत ही कम पैसे पड़े हुए है. उसने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और उसकी टोपी में डाल दिए. फिर उसने उस अंधे आदमी से पूछे बिना ही उसके पास पड़ी स्लेट को पलटकर उसमें दूसरा मैसेज लिख दिया. इतना करके वो वहाँ से चला गया.

एक दिन जब ऑफिस के सभी कर्मचारी ऑफिस पहुँचे, तो उन्हें दरवाजे पर एक पर्ची चिपकी हुई मिली. उस पर लिखा था – “कल उस इंसान की मौत हो गई, जो कंपनी में आपकी प्रगति में बाधक था. उसे श्रद्धांजली देने के लिए सेमिनार हाल में एक सभा आयोजित की गई है. ठीक ११ बजे श्रद्धांजली सभा में सबका उपस्थित होना अपेक्षित है.” अपने एक सहकर्मी की मौत की खबर पढ़कर पहले तो सभी दु:खी हुए. लेकिन कुछ देर बाद उन सबमें ये जिज्ञासा उत्पन्न होने लगी कि आखिर वह कौन था, जो उनकी और कंपनी की प्रगति में बाधक था?

बहुत समय पहले की बात है. एक प्रसिद्ध ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे. उनके गुरुकुल में अनेक राज्यों के राजकुमारों के साथ-साथ साधारण परिवारों के बालक भी शिक्षा प्राप्त करते थे. उस दिन वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े ही उत्साह से अपने-अपने घर लौटने की तैयारी में थे.

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