एक बार एक बहेलिया बादशाह अकबर के दरबार में आया. उसके पास ना-ना प्रकार के पक्षी थे. उसके पास एक बहुत सुंदर तोता था, जिसे उसने अच्छी-अच्छी बातें बोलनी सिखाई थी. बहेलिये ने बादशाह अकबर ने सामने अपने तोते का यह गुण प्रदर्शित किया. वह तोते से जो भी प्रश्न करता, तोता उसका झट से उत्तर दे देता. उसने तोते से पूछा, “बताओ, यह किसका दरबार है?”

बादशाह अकबर का दरबार लगा हुआ था. दरबार में अन्य सभी दरबारी उपस्थित थे, केवल बीरबल को छोड़कर. बीरबल की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर कुछ दरबारी उनके विरूद्ध बादशाह के कान भरने लगे. वे कहने लगे, “जहाँपनाह! बीरबल अक्सर दरबार में विलंब से आते है और चालाकीपूर्ण बातों से आपको मना लेते हैं.”

एक रात बादशाह अकबर अपने दरबारियों को साथ लेकर सैर पर निकले. सैर करते हुए वे सभी यमुना नदी के तट पर पहुँच गए. वह ठंड का मौसम था. दिल्ली में भी कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. यमुना के सामानांतर टहलते हुए अचानक ही जाने बादशाह अकबर को क्या सूझा कि उन्होंने अपनी एक उंगली यमुना के ठंडे पानी में डाल दी.

एक बार एक अमीर आदमी ने हसन नामक अपने पड़ोसी को सजा दिलवाने की सोची और उस पर अपने घर से सोने का कीमती हार चुराने का इलज़ाम लगा दिया. यह शिकायत उसके बादशाह अकबर के दरबार तक पहुँचा दी. दरबार में जब मुक़दमा चला, तो अकबर ने उस अमीर आदमी से पूछा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि हसन ने ही तुम्हारे घर से वह कीमती हार चुराया है?”

बीरबल की अक्लमंदी और हाज़िरजवाबी के सामने अक्सर दरबार के मंत्रियों को नीचा देखना पड़ता था. इसलिए वे मन ही मन बीरबल से इर्ष्या करते थे. एक मंत्री बादशाह का मुख्य सलाह्कर बनने का इच्छुक था. लेकिन बीरबल के मुख्य सलाहकार के पद पर रहते तक ऐसा होना संभव नहीं था. इसलिए वह हमेशा कोई न कोई युक्ति सोचता रहता, ताकि बीरबल को उस पद से हटाया जा सके.

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