राजा की चुनौती : तेनाली राम की कहानी | Raja Ki Chunauti Tenali Ram Story In Hindi

Raja Ki Chunauti Tenali Ram Story In Hindi
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Raja Ki Chunauti Tenali Ram Story In Hindi : राजा कृष्णदेव राय और तेनाली राम वार्तालाप कर रहे थे. अचानक उनके मध्य झूठ बोलने के विषय पर चर्चा चल पड़ी. तेनाली राम ने राजा से कहा कि लोगों को जब भी मौका मिलता है, वे झूठ बोल देते हैं.

राजा कृष्णदेव राय तेनाली राम की इस बात से सहमत नहीं थे. वे बोले, “ऐसा नहीं हैं. लोग तभी झूठ बोलते हैं, जब अपरिहार्य होता है. विजय नगर के सिंहासन पर विराजमान होने के उपरांत मैंने कभी झूठ नहीं बोला और मुझे विश्वास है कि मैं आगे भी कभी झूठ नहीं बोलूंगा.”

तेनाली राम ने नम्रता पूर्वक कहा, “महाराज, दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो झूठ न बोलता हो. राजा भी इसके अपवाद नहीं है.”

राजा कृष्णदेव राय इस बात पर अड़े रहे कि वह कभी झूठ नहीं बोलेंगे और उन्होंने तेनाली राम को चुनौती कि अगर वह उन्हें गलत प्रमाणित करके दिखाए, तो वह उनका लोहा मान लेंगे.

तेनाली राम ने चुनौती स्वीकार कर राजा से एक हज़ार सोने की मुद्रायें मांगी और एक वर्ष का समय भी, ताकि अपनी बात को प्रमाणित कर सके.

अगले एक वर्ष तक तेनाली राम दरबार में उपस्थित नहीं हुए. राजा से प्राप्त धन से वे एक सुंदर और आलीशान भवन का निर्माण करवाने लगे. उस भवन के एक कक्ष की दीवार पर उन्होंने एक विशाल दर्पण लगवाया.

भवन का निर्माण पूर्ण होने के उपरांत अपनी योजना अनुसार तेनाली राम ने साधू का भेष धरा और राजा कृष्णदेव राय के दरबार में पहुँच गए. उस भेष में उन्हें कोई दरबारी पहचान नहीं सका, स्वयं राजा कृष्णदेव राय भी नहीं.

साधू के भेष में छुपे तेनाली राम ने राजा को बताया कि उनका एक बहुत ही सुंदर प्रार्थना भवन है, जहाँ वे दैनिक पूजा-पाठ और प्रार्थना किया करते है. उसकी निष्कपट प्रार्थना से प्रसन्न होकर ईश्वर उन्हें रोज़ दर्शन देते हैं. उन्होंने राजा को उस भवन में आमंत्रित करते हुए यह भी बताया कि ईश्वर मात्र उसे ही दर्शन देते हैं, जिसने अपने जीवन में कभी झूठ न बोला हो.

यह बात सुनकर राजा कृष्णदेव राय उस भवन में जाने के लिए उत्सुक हो गए. अगले दिन अपने मंत्रियों के साथ वे तेनाली राम के नवनिर्मित भवन में जा पहुँचे. सत्य का पता लगाने के उद्देश्य से उन्होंने अपने एक मंत्री को उस कक्ष के भेजा, जहाँ विशाल दर्पण लगा हुआ था.

जब मंत्री कक्ष में पहुँचा, तो उसे दीवार पर लगे दर्पण में अपना ही प्रतिबिंब दिखाई पड़ा. उसे ईश्वर के दर्शन नहीं हुए. किंतु भय के कारण सच्चाई बताने के स्थान पर उसने साधु की बात को सत्य करार देते हुए कहा कि उसे कक्ष में ईश्वर के दर्शन हुए हैं.

राजा ने दूसरे मंत्री को कक्ष में भेजा. उस मंत्री को भी दर्पण पर ईश्वर नहीं अपना ही प्रतिबिंब दिखाई पड़ा. किंतु डर के मारे उसने भी बाहर आकर झूठ कहा. एक-एक करके साथ आये सभी मंत्री कक्ष में गए और बाहर आकर सबने राजा से झूठ कहा.

अपने मंत्रियों की बात से प्रभावित होकर अंत में राजा स्वयं कक्ष में गए. वहाँ उत्सुकता से उन्होंने दीवार पर लगे दर्पण में देखा. उन्हें अपना ही प्रतिबिंब दिखाई पड़ा. बाहर निकलने से पहले उन्हें साधु की बात स्मरण हो आई कि मात्र उसी व्यक्ति को ईश्वर के दर्शन होंगे, जिसने जीवन में कभी झूठ न बोला हो. वे चिंतित हो उठे कि यदि बाहर जाकर उन्होंने सच कहा तो लोग समझेंगे कि वे झूठे हैं. इसलिए बाहर आने के बाद उन्होंने सबसे कहा कि उन्हें भी ईश्वर के दर्शन हुए हैं.

साधु के भेष में तेनाली राम ने पूछा, “महाराज! क्या आपको सच में भीतर ईश्वर के दर्शन हुए?”

राजा ने उत्तर दिया, “हाँ”

साधु ने पुनः यह प्रश्न दोहराया. राजा ने पुनः हामी भरी.

इसके बाद साधु ने संदेह की दृष्टि से देखते हुए पुनः यह प्रश्न किया, तो राजा चिढ़ गए और उसे चेतावनी दी कि वह उन्हें अपमानित कर रहा है, जिसके लिए उसे दंड भी दिया जा सकता है.

मुस्कुराते हुए साधु रूपी तेनाली राम ने अपनी दाढ़ी निकाल दी. राजा साधु के स्थान पर तेनाली राम को देखकर चौंक गए. तेनाली राम ने राजा को एक वर्ष पूर्व उनकी दी गई चुनौती याद दिलाई और कहा, “महाराज! उस कक्ष में महज़ एक दर्पण लगा हुआ है, जिसमें स्वयं का प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है. ईश्वर के दर्शन नहीं होते. किंतु झूठे कहलाये जाने के डर से मंत्रियों सहित आपने भी बाहर आकर झूठ बोला. अब तो मेरी बात मान जाईये कि दुनिया में कभी न कभी हर कोई झूठ बोलता है.”

राजा कृष्णदेव राय अपने किये पर लज्जित हुए और अपनी हार स्वीकार कर ली.


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