दूसरा दीपक चाणक्य का प्रेरक प्रसंग | Doosra Deepak Chanakya Prerak Prasang

चाणक्य नीति-शास्त्र के लिए प्रसिद्ध थे. उनका गुणगान सुनकर एक दिन एक चीनी दार्शनिक उनसे मिलने आया. जब वह चाणक्य के घर पहुँचा, तब तक अँधेरा हो चुका था. घर में प्रवेश करते समय उसने देखा कि तेल से दीप्यमान एक दीपक के प्रकाश में चाणक्य कोई ग्रन्थ लिखने में व्यस्त है. चाणक्य की दृष्टि जब आगंतुक पर पड़ी, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए उसका स्वागत किया और उसे अंदर विराजमान होने को कहा. फिर शीघ्रता से अपना लेखन कार्य समाप्त कर उन्होंने उस दीपक को बुझा दिया, जिसके प्रकाश में वे आगंतुक के आगमन तक कार्य कर रहे थे.

सफलता का रहस्य : सुकरात का प्रेरक प्रसंग | Safalta Ka Rahasya Socrates Prerak Prasang

एक बार एक नौजवान लड़का महान दार्शनिक सुकरात के पास आया और उनसे पूछा, “सफलता का रहस्य क्या है?” सुकरात ने उससे कहा, “मैं तुम्हें कल उत्तर दूंगा. कल तुम मुझे नदी के किनारे मिलो.” दूसरे दिन वो लड़का सुकरात से नदी के किनारे मिला. सुकरात उसे लेकर नदी में आगे बढ़ने लगे. वे दोनो नदी में तब तक आगे बढ़ते रहे, जब तक नदी का पानी उनके गले तक न आ गया. वहाँ पहुंचकर अचानक ही सुकरात ने उस लड़के का सिर पकड़कर पानी में डुबो दिया.

कर्नल सैंडर्स का जन्म 9 सितम्बर 1890 को  अमरीका के इंडियाना प्रान्त के हेनरिविले नामक कस्बे में एक गरीब परिवार में हुआ था. उनके पिता विल्बर डेविड कसाई थे और माता मार्गरेट एन सैंडर्स गृहणी. वे तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े थे. उनके पिता की असमय मृत्यु जब हुई, उस समय वे मात्र 5 वर्ष के थे. पिता का साया सिर से उठने के बाद उनके जीवन में मुश्किलों का सिलसिला प्रारंभ हो गया.

MDH मसाला की सफलता की कहानी | MDH Owner Mahashay Dharampal Gulati Success Story In Hindi

दोस्तों, आज मैं मसाला वाले के मिसाल बनने की कहानी आपसे share कर रही हूँ. ये कहानी है ‘महाशय धर्मपाल गुलाटी’ Mahashay Dharmpal Gulati की, जो कभी अपने जीवन निर्वाह के लिए तांगा चलाते थे और आज Masala King ‘मसालों के बादशाह’ के नाम से मशहूर है. आज इनके बनाये MDH Masale हर घर की रसोई की पहचान है. महाशय धर्मपाल गुलाटी के जीवन में उतार-चढ़ाव, संघर्ष, परिश्रम…

कर्त्तव्य – पालन लाल बहादुर शास्त्री का प्रेरक प्रसंग | Kartavya Palan Lal Bahadur Shastri Prerak Prasang

बात उन दिनों की है, जब लाल बहादुर शास्त्री रेल मंत्री थे. रेल मंत्री होकर भी उनका रहन-सहन बिल्कुल साधारण था. वे स्वयं नियमों का सख्ती से पालन करते थे और दूसरों से भी भी यही अपेक्षा रखते थे. एक बार उन्हें बनारस से ट्रेन पकड़नी थी. लेकिन, लाख कोशिशों के बाद भी वे समय पर स्टेशन पर नहीं पहुँच सके. ट्रेन के जाने का सिग्नल हो चुका था. लेकिन जैसे ही गार्ड को पता चला कि मंत्री महोदय स्टेशन पहुँचने ही वाले है, उसने हरी झंडी नीची कर दी और शास्त्री जी का इंतजार करने लगा.