यूं बनी दुनिया की सबसे पहली जीन्स | History Of Jeans In Hindi

History Of Jeans In Hindi
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History Of Jeans In Hindi : जीन्स का फैशन सदाबहार है. कोई भी मौसम हो, जीन्स हर मौसम में डिमांड में रहती है. लड़का हो या लड़की, ये हर किसी पर फबती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जीन्स के जनक कौन हैं?

नहीं?

तो आइये आज जानते हैं जीन्स की कहानी.

जीन्स की खोज का श्रेय लीवाइ स्ट्रॉस को जाता है. उनकी कंपनी का नाम ‘Levi Strauss & Co.’ है, जिसकी जीन्स बहुत मशहूर है.

लीवाइ स्ट्रॉस का जन्म २६ फरवरी १८२९ को जर्मनी में हुआ था. १८ वर्ष की उम्र में वे अपनी माँ और बहनों के साथ न्यूयॉर्क चले आये और अपने बड़े भाई जोनस और लुइस के ड्राई-गुड्स के व्यवसाय ‘J. Strauss Brothers & Co.’ में हाथ बंटाने लगे.

अपने भाई की न्यूयॉर्क की ड्राई-गुड्स स्टोर के विस्तार हेतु वे १८५३ में २३ वर्ष की उम्र में सैन फ्रांसिस्को आ गए और ड्राई-गुड्स स्टोर की ब्रांच खोल ली. लगभग २० वर्षों तक वे सैन फ्रांसिस्को में ड्राई-गुड्स का व्यवसाय करते रहे और एक व्यवसायी के साथ ही समाजसेवी के तौर पर भी अच्छा-खासा नाम कमा लिया.

सैन फ्रांसिस्को में चाँदी की खानें थी, जहाँ कई खनिक चाँदी खोजने का काम करते थे. वे खनिक अपने पेंट विशेषकर उसकी जेबों के फटने से परेशान थे. जेबों में चाँदी में ढेले रखने से वो जल्दी फट जाया करती थी. इसलिये वे ऐसी पेंट चाहते थे, जो मजबूत होने के साथ-साथ सुविधाजनक हो और लंबे समय तक चल सके.

एक दिन अल्कली आइक नामक खनिक उस क्षेत्र के एक दर्जी जेकब डेविस के पास आया और अपनी समस्या बताते हुई उसका समाधान करने का अनुरोध किया. सोच-विचार उपरांत जेकब डेविस ने इस समस्या को हल करने का एक उपाय खोज निकाला. उसने पेंट को मजबूती प्रदान करने के लिए उन जगहों पर तांबे के रिवेट लगा दिए जहाँ अधिक जोर पड़ता था, मसलन जेब के चारों कोनों और बटन फ्लाय पर.

खनिक अल्कली आइक को यह रिवेट वाली पेंट बहुत पसंद आई क्योंकि इससे उसकी समस्या हल हो चुकी थी. जब वह धन्यवाद देने दर्जी जेकब डेविस के पास पहुँचा, तो जेकब डेविस ने सोचा कि इस तरह ही अन्य समस्त खनिकों की समस्या हल की जा सकती है.

अपनी इस खोज का पेटेंट लेने के इच्छुक जेकब डेविस ने अपनी पत्नी से सलाह की, तो उसे यह विचार मूर्खतापूर्ण लगा और उसके कह दिया कि वह उसे इस तरह की फिजूलखर्ची नहीं करने देगी. उस समय पेटेंट की फ़ीस ६८ डॉलर थी और जेकब डेविस के पास उतने पैसे नहीं थे.

लेकिन जेकब डेविस को अपने Idea पर यकीन था, इसलिए वह लीवाइ स्ट्रॉस के पास गया. वह उनसे उधार पर कपड़े लिया करता था. उसने लीवाइ स्ट्रॉस के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि अगर वह पेटेंट की फीस भर दे, तो वे दोनों ही उस पेटेंट के आधे-आधे मालिक बन जायेंगे.

दूरदर्शी लीवाइ स्ट्रॉस को जेकब डेविस की इस खोज में भरपूर संभावना नज़र आई और वे राज़ी हो गए. दोनों ने मिलकर पेटेंट के लिए आवेदन कर दिया. लेकिन पेटेंट मिलने में देरी हो रही थी.

इस देरी से कुंठित होकर जेकब डेविस ने पेटेंट का अपना आधा हिस्सा भी लीवाइ स्ट्रॉस को बेच दिया. दस माह बाद जब २० मई १८७३ को लीवाइ स्ट्रॉस को पेटेंट मिला, तो वे उस खोज के पूरी तरह मालिक बन गए, जो उन्होंने की ही नहीं थी.

पेटेंट मिलने के बाद उन्होंने रिवेट वाली पेंटों का व्यापक स्तर पर उत्पादन प्रारम्भ किया. १९६० तक इसे “waist overalls” या सिर्फ “overalls” कहा जाता था. इसकी कीमत उन्होंने २२ सेंट रखी तथा इसका प्रचार करने के लिए विज्ञापन निकाले.

विज्ञापन में बताया गया कि यह मुख्यतः किसानों, मैकेनिकों, मजदूरों, खनिकों के लिये बनाई गई है. इसकी मजबूती की गारंटी दी गई और कहा गया कि इसके फटने पर एक नई जीन्स मुफ्त में दी जायेगी. जीन्स को खींचने वाले दो घोड़े लीवाइस जीन्स का ट्रेडमार्क बन गए,

मार्किट में आते ही यह जीन्स लोकप्रिय हो गई. पेटेंट के कारण अगले २० वर्षों तक रिवेट वाली जीन्स पर लीवाइ स्ट्रॉस का एकाधिकार रहा. बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए इन जीन्सों के निर्माण के लिए कई फैक्ट्रीज खोली गई.

१८९० में लीवाइ स्ट्रॉस ने ‘लीवाइ स्ट्रॉस एंड कंपनी’ स्थापित की. इस जीन्स की बदौलत लीवाइ स्ट्रॉस इतने अमीर बन गए कि अपनी मृत्यु के समय अपने पीछे ६० लाख डॉलर छोड़ कर गए. इस तरह अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए लीवाइ स्ट्रॉस “जीन्स क्रांति के जनक” बन गए.


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