अंतिम इच्छा : तेनाली राम की कहानी | Antim Ichchha Tenali Ram Story In Hindi

Antim Ichchha Tenali Ram Story In Hindi
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Antim Ichchha Tenali Ram Story In Hindi : राजा कृष्णदेव राय की माता बहुत वृद्ध हो चली थी और अक्सर बीमार रहा करती थी. एक बार वे गंभीर रूप से बीमार पड़ी. उन्हें महसूस होने लगा था कि उनका अंतिम समय निकट है. मृत्यु पूर्व वे अपना प्रिय फल आम दान करना चाहती थी.

उन्होंने राजा कृष्णदेव राय को अपनी अंतिम इच्छा के बारे में बताया. किंतु इसके पूर्व कि उनकी अंतिम इच्छा पूर्ण हो पाती, वे चल बसी. इस प्रकार उनकी अंतिम इच्छा अपूर्ण रह गई.

माता का अंतिम संस्कार करने एक उपरांत राजा कृष्णदेव राय के विद्वान ब्राह्मणों को बुलाया और उन्हें अपनी माता की अंतिम अपूर्ण इच्छा से अवगत करवाया.

कुछ देर चिंतन करने के उपरांत ब्राह्मण बोले, “महाराज! अंतिम इच्छा पूर्ण न हो पाने के कारण आपकी माता की मुक्ति असंभव है. वे प्रेतयोनी में भटकती रहेंगी और उनकी आत्मा को कभी शांति प्राप्त नहीं हो पायेगी.”

यह सुनकर राजा चिंतित हो उठे और ब्राह्मणों से इसका समाधान पूछा. ब्राह्मणों ने बताया, “महाराज! समाधान स्वरुप आपको ५० ब्राह्मणों को भोजन करवाना होगा और उन्हें ५० सोने के आम दान में देने होंगे. तभी आपकी माता की आत्मा को शांति प्राप्त हो सकेगी.”

राजा कृष्णदेव राय के ब्राह्मणों की सलाह मान ली और ५० ब्राह्मणों को भोजन करवाकर ५० सोने के आम दान में दिए.

जब तेनाली राम को यह बात पता चली, तो वह समझ गया कि ब्राह्मणों ने महाराज की सरलता का लाभ उठाया है. उसने ब्राह्मणों को सबक सिखाने का निश्चय किया.

अगले दिन उसने ब्राह्मणों को न्योता भेजा, जिसमें लिखा था कि मेरी माता भी अपनी अंतिम इच्छा पूर्ण किये बिना स्वर्ग सिधार गई थी. मुझे ज्ञात हुआ है कि इस स्थिति में उनकी आत्मा को शांति प्राप्त होना असंभव है. इसलिए मैंने आप सबके लिए भोजन की व्यवस्था की है, जिसने उपरांत माता की अंतिम इच्छा की पूर्ति हेतु दान अर्पण किया जायेगा.

न्योता पाकर ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुए. उन्हें पूर्ण आशा थी कि तेनाली राम के घर से भी उन्हें कीमती दान प्राप्त होगा क्योंकि वह भी राजदरबार में विदूषक था.

सभी नियत तिथि को तेनाली राम के घर पहुँचे और भोजन उपरांत दान की प्रतीक्षा करने लगे. कुछ देर उपरांत तेनाली राम उनके सामने गर्म लोहे की सलाखें लेकर प्रकट हुआ और बोला, “मेरी माता फोड़ों के दर्द से परेशान थी और उनकी अंतिम इच्छा थी कि मैं लोहे की गर्म सलाखों से उनकी सिकाई करूं. किंतु ऐसा करने के पूर्व ही वो मृत्यु को प्राप्त हो गई. अब आप लोगों के साथ वैसा ही करके मैं अपनी माता की अंतिम इच्छा पूर्ण करूंगा.”

तेनाली राम की बात सुनकर सभी ब्राह्मण डर गए. उन्होंने पूछा, “ऐसा तुमसे किसने कहा है कि लोहे की सलाखों से हमें दागकर तुम्हारी माता की आत्मा को शांति मिलेगी.”

“मान्यवर! जब सोने के आम दान में देने से महाराज की माता की आत्मा को शांति मिल सकती है, तो लोहे की गर्म सलाखों से दागकर मेरी माता को क्यों नहीं?” तेनाली राम के उत्तर दिया.

सभी ब्राह्मण तेनाली राम का इशारा समझ गए और उसके समक्ष नतमस्तक होकर क्षमा मांगने लगे. उन्होंने अपने सारे आम तेनाली राम को दे दिए.

किंतु वहाँ से जाने के उपरांत उन्होंने राजा कृष्णदेव राय से तेनाली राम की शिकायत कर दी. क्रोधित होकर राजा ने तेनाली राम को दरबार में बुलवाया और कहा, “तेनाली राम ! यदि तुम्हें सोने के आम चाहिए थे, तो हमसे मांग लिया होता. लोभ में आकर इस तरह का व्यवहार आपत्तिजनक है.”

इस पर तेनाली राम ने उत्तर दिया, “महाराज! ये मेरा लोभ नहीं, अपितु उन ब्राह्मणों का लोभ है. जो आपकी माता की आत्मा की शांति के लिए दान में सोने के आम ग्रहण कर सकते है, किंतु मेरी माता की आत्मा की शांति के लिए लोहे की गर्म सलाखें नहीं.”

राजा सभी ब्राह्मणों की कारस्तानी समझ गए और उन्हें बुलाकर ऐसे लोभी प्रवृति त्यागने की समझाईश दी.


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